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भविष्य का साहित्य, कला और संस्कृति: सोशल मीडिया एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में

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  " साहित्य , कला और संस्कृति समाज की आत्मा होते हैं।" यह उक्ति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि किसी भी सभ्यता की पहचान उसके साहित्य , कला और सांस्कृतिक मूल्यों में निहित होती है। समय के साथ समाज बदलता है , और उसके साथ-साथ इन क्षेत्रों में भी परिवर्तन होते हैं। वर्तमान समय डिजिटल युग की ओर बढ़ चुका है , जहाँ सोशल मीडिया , कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) , और आभासी वास्तविकता (वी.आर.) जैसी तकनीकों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। आज यह प्रश्न प्रासंगिक हो गया है कि ए.आई. और डिजिटल माध्यमों के प्रभाव से भविष्य में साहित्य , कला और संस्कृति का स्वरूप कैसा होगा ? क्या यह केवल तकनीकी नवाचारों का अनुसरण करेगा , या अपनी मौलिकता और संवेदनशीलता को बनाए रखेगा ? इस निबंध में हम अतीत , वर्तमान और भविष्य की तुलनात्मक दृष्टि से साहित्य , कला और संस्कृति पर ए.आई. और सोशल मीडिया के प्रभाव का विश्लेषण करेंगे। अतीत , वर्तमान और भविष्य: साहित्य , कला और संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन 1. अतीत: शास्त्रीय युग और मौलिक रचनात्मकता प्राचीन काल में साहित्य और कला मौखिक परंपरा , लिपिबद्ध ग्रंथों और मूर्तिकल...

सनातन प्रकृति-बोध और आधुनिक पर्यावरणीय संकट: एक महासंवाद

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पृथ्वी माता और वैश्विक चिंता मानव सभ्यता के इतिहास में पर्यावरण कभी भी केवल एक ' विषय ' नहीं रहा , बल्कि वह ' अस्तित्व ' का पर्याय रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ऋषि ने घोषणा की: -- " माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।"    ( भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।) यह केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं है , बल्कि एक पारिस्थितिक सत्य ( Ecological Truth) है। आज जब 21 वीं सदी में हम वैश्विक तापन ( Global Warming), जैव-विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन जैसी विभीषिकाओं से जूझ रहे हैं , तब सनातन भारतीय दृष्टि और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना के बीच एक संवाद अनिवार्य हो गया है। आज का संकट केवल कार्बन उत्सर्जन का नहीं है , बल्कि उस ' दृष्टि ' का है जिसने प्रकृति को ' माता ' के स्थान पर ' भोग्या ' (Resource) मान लिया है। 1. वैदिक पारिस्थितिकी: ' इन्द्र-गुप्त ' पृथ्वी और आधुनिक विज्ञान पृथ्वीसूक्त का नौवां मंत्र हमें एक विराट सुरक्षा चक्र का स्मरण कराता है: गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु। बसु कृष्णां रोहिणीं विश्व...