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सनातन प्रकृति-बोध और आधुनिक पर्यावरणीय संकट: एक महासंवाद

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पृथ्वी माता और वैश्विक चिंता मानव सभ्यता के इतिहास में पर्यावरण कभी भी केवल एक ' विषय ' नहीं रहा , बल्कि वह ' अस्तित्व ' का पर्याय रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ऋषि ने घोषणा की: -- " माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।"    ( भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।) यह केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं है , बल्कि एक पारिस्थितिक सत्य ( Ecological Truth) है। आज जब 21 वीं सदी में हम वैश्विक तापन ( Global Warming), जैव-विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन जैसी विभीषिकाओं से जूझ रहे हैं , तब सनातन भारतीय दृष्टि और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना के बीच एक संवाद अनिवार्य हो गया है। आज का संकट केवल कार्बन उत्सर्जन का नहीं है , बल्कि उस ' दृष्टि ' का है जिसने प्रकृति को ' माता ' के स्थान पर ' भोग्या ' (Resource) मान लिया है। 1. वैदिक पारिस्थितिकी: ' इन्द्र-गुप्त ' पृथ्वी और आधुनिक विज्ञान पृथ्वीसूक्त का नौवां मंत्र हमें एक विराट सुरक्षा चक्र का स्मरण कराता है: गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु। बसु कृष्णां रोहिणीं विश्व...

कोड और कल्पवृक्ष: डिजिटल बुद्धि में स्पंदित सनातन जड़ें

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  वर्तमान बौद्धिक सामाजिक युग: स्वरूप और काल-निर्धारण वर्तमान बौद्धिक सामाजिक युग मानवीय विकास के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है। यह न केवल तकनीकों का परिवर्तन है , बल्कि मानवीय चेतना और सामाजिक संरचना के पुनर्गठन का काल है। 1. डिजिटल क्रांति का उद्भव ( 1970 से वर्तमान) इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने इस युग को ' उत्तर-औद्योगिक समाज ' (Post-Industrial Society) के रूप में चिह्नित किया है। प्रथम चरण ( 1970-1990): सूक्ष्म-प्रक्रिया ( Microprocessors) और पर्सनल कंप्यूटर का उदय। यहाँ से सूचना का लोकतंत्रीकरण शुरू हुआ। द्वितीय चरण ( 1990-2010): इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब ( WWW) का विस्तार। इसने ' नेटवर्क समाज ' की नींव रखी। तृतीय चरण ( 2010- वर्तमान): बिग डेटा , कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( AI), और इंटरनेट ऑफ थिंग्स ( IoT) का युग। इसे ही " डिजिटल बुद्धि" का युग कहा जाता है। युग का स्वरूप: "डिजिटल बुद्धि" और डेटा-संस्कृति आज की सामाजिक व्यवस्था ' वस्तुओं ' के उत्पादन से हटकर ' विचार...