सनातन प्रकृति-बोध और आधुनिक पर्यावरणीय संकट: एक महासंवाद
पृथ्वी माता और वैश्विक चिंता मानव सभ्यता के इतिहास में पर्यावरण कभी भी केवल एक ' विषय ' नहीं रहा , बल्कि वह ' अस्तित्व ' का पर्याय रहा है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ऋषि ने घोषणा की: -- " माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।" ( भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।) यह केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं है , बल्कि एक पारिस्थितिक सत्य ( Ecological Truth) है। आज जब 21 वीं सदी में हम वैश्विक तापन ( Global Warming), जैव-विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन जैसी विभीषिकाओं से जूझ रहे हैं , तब सनातन भारतीय दृष्टि और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना के बीच एक संवाद अनिवार्य हो गया है। आज का संकट केवल कार्बन उत्सर्जन का नहीं है , बल्कि उस ' दृष्टि ' का है जिसने प्रकृति को ' माता ' के स्थान पर ' भोग्या ' (Resource) मान लिया है। 1. वैदिक पारिस्थितिकी: ' इन्द्र-गुप्त ' पृथ्वी और आधुनिक विज्ञान पृथ्वीसूक्त का नौवां मंत्र हमें एक विराट सुरक्षा चक्र का स्मरण कराता है: गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु। बसु कृष्णां रोहिणीं विश्व...