सनातन सूत्र - यत्-पिण्डे तत्-ब्रह्माण्डे: ब्रह्म-अंड और ब्रह्म-पिंड की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या
The Param-Purusha in The Universe प्राचीन उपनिषदों में एक सूक्ष्म सूत्र है: " यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे , यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे।" ( जो कुछ पिण्ड में है वही ब्रह्मांड में है , और जो कुछ ब्रह्मांड में है वही पिण्ड में है।) इस सूत्र में भारतीय दर्शन का अद्वितीय सनातन दृष्टिकोण निहित है। मनुष्य और ब्रह्मांड दो पृथक सत्ता नहीं , बल्कि एक ही चेतन और स्थूल वास्तविकता के दो स्तर हैं। पिण्ड (शरीर) — ब्रह्मांड का सूक्ष्म प्रतिरूप। ब्रह्माण्ड (कॉस्मिक एग) — मनुष्य के भीतर सूक्ष्मतर रूप में स्थित चेतना का विराट स्वरूप। आधुनिक विज्ञान जब ब्रह्मांडीय संरचनाओं और मानव शरीर के बीच अद्भुत साम्य खोजता है , तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे प्राचीन ऋषि केवल दार्शनिक नहीं थे , बल्कि ब्रह्मांड के अद्वितीय वैज्ञानिक द्रष्टा भी थे। १. अंड और पिंड का दार्शनिक भेद संस्कृत में अंड और पिंड दोनों का विशेष महत्व है। अंड का अर्थ है — गोलाकार , बीज , वह सूक्ष्मतम कोशिका जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का संभावनात्मक मानचित्र छिपा हो। पिंड ...