Does God Exist!

 

अधूरापन: सत्य की अंतहीन यात्रा और अस्तित्व का सौंदर्य

(ईश्वर, विज्ञान और दर्शन के त्रिकोण में एक विमर्श)




बहस का कोलाहल और पूर्णता की मृगतृष्णा

हाल ही में सोशल मीडिया पर छिड़ी 'Does God Exist?' जैसी बहसें दरअसल बौद्धिक व्यायाम कम और 'ईगो-क्लैश' ज्यादा नजर आती हैं। हम मनुष्य स्वभाव से ही "पक्के" जवाबों के प्रेमी हैं। हम एक ऐसा अंतिम सत्य चाहते हैं जिसे हम मेज पर पटक कर कह सकें—"बस, यही सच है!"

किंतु दर्शन (Philosophy) का वास्तविक आनंद उत्तरों में नहीं, बल्कि उन प्रश्नों में है जो हमें बेचैन रखते हैं। आधुनिक दौर के सोशल मीडिया पर जहाँ हर चीज़ 'इंस्टेंट' है, वहां स्थायी और गंभीर विमर्श की गुंजाइश कम बची है। इस हादसे-नुमा बहस के 'वकीलों' ने दरअसल सत्य को एक 'रेस' बना दिया है, जबकि यह एक 'सफर' है।

भारतीय दर्शन: अज्ञेयवाद और नेति-नेति का साहस

भारत की षड्दर्शन परंपरा अद्भुत है। इसमें नास्तिकता (Atheism) और अज्ञेयवाद (Agnosticism) के लिए उतनी ही जगह है जितनी आस्तिकता के लिए। वेदों ने कभी ईश्वर को 'परिभाषित' करने का संकीर्ण प्रयास नहीं किया। उपनिषदों ने 'ब्रह्म' की जिज्ञासा की और निष्कर्ष में कहा कि जो कुछ भी हम शब्दों में बांध सकते हैं, वह 'अविद्या' है—संसार चलाने के लिए आवश्यक सूचना, पर अंतिम सत्य नहीं।

अतिरिक्त तथ्य: ऋग्वेद का नासदीय सूक्त वैश्विक साहित्य का वह शिखर है जो 'परम सत्ता' पर भी संदेह करने का साहस रखता है। जब वह कहता है— "सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद" (शायद वह ऊपर बैठा अध्यक्ष भी इसे नहीं जानता!)—तो वह 'अधूरेपन' को ज्ञान की पहली सीढ़ी बना देता है। यह स्वीकारोक्ति कि "मुझे नहीं पता", अहंकार के विसर्जन की शुरुआत है।

'कन्टिन्जेन्सी' और हाथी के पाँव का भ्रम

इस हालिया बहस में 'कन्टिन्जेन्ट' (संभाव्य) शब्द का प्रयोग काफी हुआ। दार्शनिक रूप से यह तर्क देता है कि हर वस्तु का अस्तित्व किसी दूसरे पर निर्भर है। विडंबना देखिए, दोनों पक्षों के विद्वान उसी पुरानी कहावत को चरितार्थ कर रहे थे जहाँ सात अंधे हाथी के अलग-अलग अंगों को छूकर उसे 'पूर्ण सत्य' मान बैठते हैं। कोई पाँव पकड़कर कह रहा है कि हाथी खंभा है, तो कोई उसे दीवार बता रहा है। अद्वैत वेदांत ने इसीलिए 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं) का मार्ग चुना। 'पूरे' को समझाने के लिए 'अधूरे' का सहारा लेना ही पड़ता है—जैसे उंगली चांद की ओर इशारा तो करती है, पर उंगली चांद नहीं होती।

स्याद्वाद: शांति और समरसता का सूत्र

जैन दर्शन का 'स्याद्वाद' और 'अनेकांतवाद' आज के ध्रुवीकृत समाज के लिए सबसे बड़ी औषधि है। इसका अर्थ है—"शायद, किसी एक दृष्टिकोण से यह सही हो।"

  • अतिरिक्त तथ्य: स्याद्वाद हमें बताता है कि सत्य के अनंत पहलू हैं। यदि हम यह मान लें कि "मैं शायद पूरा सही नहीं हूँ", तो दुनिया से वैचारिक हिंसा और युद्ध समाप्त हो जाएं। यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि अहिंसक जीवन जीने की एक व्यावहारिक पद्धति है।

विज्ञान की गवाही: गोडेल और आइंस्टीन

हजारों साल पुराने इन दार्शनिक सत्यों की पुष्टि आज का आधुनिक विज्ञान भी कर रहा है:

  • गोडेल का अपूर्णता प्रमेय (Gödel's Incompleteness Theorem): गणित जैसे 'पक्के' विषय में भी गोडेल ने साबित किया कि किसी भी सिस्टम में हमेशा कुछ ऐसे सत्य होंगे जिन्हें उस सिस्टम के भीतर साबित नहीं किया जा सकता। यानी, 'अधूरापन' गणितीय रूप से भी अनिवार्य है।

  • सापेक्षता (Relativity): आइंस्टीन ने बताया कि 'सच' इस पर निर्भर करता है कि पर्यवेक्षक (Observer) कहाँ खड़ा है। कोई एक निश्चित सत्य (Absolute Truth) भौतिक जगत में संभव नहीं है।

निष्कर्ष: अधूरापन ही ऊर्जा है

'अधूरापन' कोई खामी या कमी नहीं है, बल्कि यह जीवन का ईंधन है। यदि पहेली सुलझ जाए, तो खेल खत्म। यदि किताब का आखिरी पन्ना पढ़ लिया जाए, तो कहानी समाप्त।

यह अधूरापन ही हमें खोजने, प्यार करने, सोचने और निरंतर विकास करने के लिए मजबूर करता है। दुनिया एक सुलझी हुई पहेली नहीं, बल्कि एक ऐसा खजाना है जो रोज थोड़ा-थोड़ा खुलता है। पूर्णता की जिद हमें जड़ (Static) बना देती है, जबकि अधूरापन हमें 'प्रवाह' (Flow) में रखता है। सच तो यह है कि खजाना मिल जाने से कहीं ज्यादा रोमांच उस नक्शे को पढ़ने और उसे खोजने के सफर में है।

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