क्या भारत अपने ‘आध्यात्मिक निर्यात’ को एक सुसंगत वैश्विक दर्शन में बदल पाएगा ?
21 वीं सदी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मानवता के पास अभूतपूर्व तकनीकी शक्ति है , परंतु उतनी ही गहरी अस्तित्वगत अस्थिरता भी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता , जैव - प्रौद्योगिकी और वैश्विक पूँजी के विस्तार ने मनुष्य को सक्षम तो बनाया है , किंतु “ क्यों ” और “ किस दिशा में ”— इन प्रश्नों को और अधिक जटिल कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में भारत का “ आध्यात्मिक निर्यात ”— योग , ध्यान , चेतना - विज्ञान और समन्वयी दर्शन — विश्व मंच पर एक वैकल्पिक संभावना के रूप में उभरता है। लेकिन मूल प्रश्न वही है : क्या यह निर्यात एक संगठित , सुसंगत वैश्विक दर्शन में परिवर्तित हो सकता है — या यह केवल आध्यात्मिक युक्तियों और तकनीकों का बिखरा हुआ संग्रह बनकर रह जाएगा ? 1. आध्यात्मिक निर्यात : अनुभव का प्रसार , दर्शन का विखंडन पिछले सौ वर्षों में भारत से विश्वस्तर पर प्रसारित आध्यात्मिक तत्वों ने वैश्विक जीवनशैली को गहराई से प्रभावित किया है। अनेक योग स्टूडियो , ध्यान - एप्स , माइंडफुलनेस - प्रोग...