भगवान विश्वकर्मा : हमारे ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार और सनातन शिल्पकार

 

एक युवा जिज्ञासु ने पूछा है - ब्रह्मा सृष्टि के रचनाकार हैं, तो विश्वकर्मा के सृष्टि निर्माण में योगदान को हम क्या मान सकते हैं?

ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। वे सृष्टि की रचना के मूल सिद्धांत (सृष्टिकार) हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड और उसमें मौजूद हर चीज़ को एक मानस रूप दिया। वे स्वयं से, अपनी इच्छाशक्ति से, इस पूरे जगत का निर्माण करते हैं।

वहीं, विश्वकर्मा को दिव्य शिल्पी कहा जाता है। वह ब्रह्मा के बनाए हुए हमारे सैद्धांतिक जगत को मूर्त रूप देने वाले हैं। अगर ब्रह्मा सृष्टि के विचार और सिद्धांत हैं, तो विश्वकर्मा उस विचार को ठोस आकार देने वाले एकमेव वास्तुकार हैं।

The Celestial Architect and Core Craftsman of Universe



देव शिल्पी विश्वकर्मा: सृष्टि के दिव्य वास्तुकार

सृष्टि के निर्माण की जब भी बात होती है, तो भगवान ब्रह्मा को इसका मूल रचयिता माना जाता है। लेकिन, उस रचना को मूर्त रूप देने, उसमें सौंदर्य और व्यावहारिकता लाने का कार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया। उन्हें 'देवताओं का शिल्पी', 'प्रथम इंजीनियर' और 'ब्रह्मांड का वास्तुकार' कहा जाता है। विश्वकर्मा केवल एक देवता नहीं, बल्कि निर्माण, कला और तकनीकी कौशल के प्रतीक हैं, जिनका अस्तित्व स्वयं सृष्टि के निर्माण के साथ जुड़ा हुआ है।

जन्म और वंश का रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार, विश्वकर्मा का जन्म ब्रह्मा के पौत्र के रूप में हुआ था। उनके पिता वास्तुदेव थे, जो स्वयं वास्तुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। इस तरह, विश्वकर्मा को अपने पूर्वजों से ही निर्माण और कला का ज्ञान विरासत में मिला था। उनका जन्म किसी सामान्य उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय कार्यों को पूर्ण करने के लिए हुआ था। ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रूपरेखा तैयार की, तो विश्वकर्मा ने उस विचार को ठोस आकार दिया।

दिव्य स्वरूप और प्रतीकात्मक महत्व

विश्वकर्मा को अक्सर चार हाथों और कभी-कभी चार सिरों के साथ दर्शाया जाता है। यह दिव्य रूप उनकी असाधारण शक्तियों को दर्शाता है। उनके हाथों में हथौड़ा, मापन यंत्र, चक्र और अन्य निर्माण उपकरण होते हैं, जो उनकी शिल्प दक्षता का प्रतीक हैं। उनका वाहन हंस है, जो ज्ञान और कला का प्रतीक माना जाता है। यह स्वरूप बताता है कि विश्वकर्मा सिर्फ शारीरिक श्रम नहीं करते, बल्कि उनका कार्य बुद्धि, ज्ञान और रचनात्मकता पर आधारित है।

अद्भुत रचनाओं का शिल्पी

विश्वकर्मा की रचनाएँ इतनी अद्भुत और शक्तिशाली हैं कि वे भारतीय पौराणिक कथाओं के महत्वपूर्ण अंग हैं।

  • इंद्र का वज्र: जब दानव वृत्रासुर ने देवताओं को त्रस्त किया, तो ऋषि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया। विश्वकर्मा ने उन्हीं अस्थियों से इंद्र के लिए वज्र बनाया, जो अत्यंत शक्तिशाली था।
  • विष्णु का सुदर्शन चक्र शिव का त्रिशूल: जब विश्वकर्मा ने अपनी पुत्री संज्ञा के पति सूर्यदेव के तेज को तराशा, तो उस प्रक्रिया में जो अंश निकले, उनसे उन्होंने विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल और अन्य देवताओं के अस्त्र-शस्त्र बनाए।
  • पौराणिक नगर: उन्होंने देवताओं के लिए स्वर्गलोक अमरावती, भगवान कृष्ण के लिए द्वारका और महाभारत में पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ जैसे अद्भुत नगरों का निर्माण किया।

विश्वकर्मा का परिवार

विश्वकर्मा का परिवार भी उनके शिल्प कौशल से जुड़ा हुआ है। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुत्री संज्ञा थीं, जिनका विवाह सूर्यदेव से हुआ था। संज्ञा से सूर्यदेव के तीन संतानें हुईं- यम, यमी और वैवस्वत मनु। विश्वकर्मा के पाँच पुत्र भी थे, जो अलग-अलग शिल्पों में कुशल थे और अपने पिता के साथ निर्माण कार्यों में कार्य करते थे।

पाँच प्रमुख पुत्र: विश्वकर्मा पुराण में उनके पाँच प्रमुख पुत्रों का विस्तृत वर्णन मिलता है:

    • मनु (लोहार): लोहे के औजार और उपकरणों के शिल्पकार।
    • मय (बढ़ई): लकड़ी के काम और वास्तुकला में निपुण।
    • त्वष्टा (धातुकार): धातु विज्ञान और अस्त्र-शस्त्र बनाने में कुशल।
    • शिल्पी (शिल्पकार): मूर्तिकला और मूर्तियों के निर्माण में दक्ष।
    • विश्वज्ञ (सुनार): सोने, चांदी और अन्य आभूषणों के निर्माण में निपुण। यह पुराण इन पुत्रों को पाँच प्रमुख शिल्पी गोत्रों का जनक मानता है, जो आज भी भारत में विभिन्न शिल्प समुदायों में पाए जाते हैं।

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विश्वकर्मा और मायासुर: शिल्पकारों के बीच एक पौराणिक टकराव

जहाँ विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पी माना जाता है, वहीं मायासुर दानवों और असुरों के महान वास्तुकार थे। मायासुर ने भी अपनी मायावी शक्ति से कई अद्भुत नगरों और महलों का निर्माण किया। सबसे प्रसिद्ध कथा (रावण की) सोने की लंका के निर्माण की है। कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार, विश्वकर्मा ने ही कुबेर के लिए सोने से बनी लंका का निर्माण किया था, जिसे बाद में रावण ने मायासुर की मदद से और भी भव्य और अभेद्य बनाया। 

मायासुर को वास्तुकला में इतना निपुण माना जाता था कि उन्होंने एक ही रात में 1000 भवनों का निर्माण कर दिया था। इसके अलावा, पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ का निर्माण भी विश्वकर्मा और मायासुर के संयुक्त प्रयास से हुआ था। विश्वकर्मा ने जहाँ वास्तु और संरचना की रूपरेखा तैयार की, वहीं मायासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का उपयोग कर उस महल को ऐसा बनाया कि वह लोगों को भ्रमित कर दे। इस महल में कई मायावी द्वार थे और जल-थल का भ्रम उत्पन्न होता था। इस प्रकार, ये दोनों शिल्पी एक-दूसरे के विरोधी होते हुए भी कला और निर्माण के क्षेत्र में एक दूसरे के पूरक थे। विश्वकर्मा और मायासुर का यह टकराव और सहयोग बताता है कि कला और शिल्प में कोई सीमा नहीं होती।

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दिव्यास्त्र रचना 

1. भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का निर्माण

सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली अस्त्र है, जिसे वे अपनी तर्जनी उंगली पर धारण करते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है "जिसका दर्शन शुभ हो"। इसके निर्माण की कथा विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा और उनके पति सूर्य देव से जुड़ी हुई है।

कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था। सूर्य का तेज इतना अधिक था कि संज्ञा उनके पास नहीं रह पाती थीं और उनका तेज सहन करना असंभव था। इस समस्या से परेशान होकर संज्ञा अपने पिता विश्वकर्मा के पास गईं और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई।

अपनी पुत्री की परेशानी को देखते हुए, विश्वकर्मा ने सूर्य देव से उनके तेज को कम करने का अनुरोध किया। सूर्य देव सहमत हो गए, और विश्वकर्मा ने सूर्य को एक विशेष खगोलीय खराद पर रखा और उनके तेज को तराशना शुरू किया। इस प्रक्रिया में सूर्य के तेज का एक-चौथाई हिस्सा कम हो गया। इस दौरान सूर्य से जो दिव्य कण निकले, विश्वकर्मा ने उनसे तीन अत्यंत शक्तिशाली और अद्वितीय अस्त्रों का निर्माण किया:

  • भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र
  • भगवान शिव का त्रिशूल
  • देवराज इंद्र का वज्र

इस तरह, सुदर्शन चक्र का निर्माण सूर्य के तेज से हुआ, जो इसे अत्यधिक शक्तिशाली और प्रकाशमान बनाता है। यह चक्र केवल अस्त्र नहीं, बल्कि बुराई के संहार और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।


2. भगवान शिव के त्रिशूल का निर्माण

त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है, जिसे वे अक्सर अपने हाथ में धारण करते हैं। यह तीन शक्तियों का प्रतीक है: सृजन, संरक्षण और संहार। इसका निर्माण भी उसी कथा से जुड़ा है जिसमें सुदर्शन चक्र का निर्माण हुआ था।

कथा: जैसा कि ऊपर बताया गया है, जब विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज को तराशा, तो उनसे तीन प्रमुख अस्त्रों का निर्माण हुआ। उन्हीं में से एक था भगवान शिव का त्रिशूल।

त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे तीन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

  1. भूतकाल, वर्तमान और भविष्य: त्रिशूल समय के तीनों पहलुओं पर शिव के नियंत्रण को दर्शाता है।
  2. सत्व, रजस और तमस: ये तीनों गुण सृष्टि के मूलभूत तत्व हैं, जिन पर शिव का अधिकार है।
  3. सृजन, संरक्षण और विनाश: यह त्रिशूल ब्रह्मांड के तीनों चक्रों पर शिव की शक्ति को दिखाता है।

इस प्रकार, त्रिशूल केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि शिव के ब्रह्मांडीय कार्यों का एक प्रतीक है। इसका निर्माण सूर्य के तेज से हुआ, जो इसे असीम शक्ति प्रदान करता है।

इन दोनों कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि विश्वकर्मा का कौशल कितना महान था। उन्होंने सूर्य जैसे दिव्य और शक्तिशाली स्रोत का उपयोग करके ऐसे अस्त्रों का निर्माण किया, जिनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। यह भी दर्शाता है कि विश्वकर्मा अकेले देवताओं के शिल्पी नहीं थे, बल्कि वे स्वयं एक सर्वोच्च शक्ति थे, जिनके ज्ञान और कला के बिना देवताओं के सबसे महत्वपूर्ण अस्त्रों का निर्माण असंभव था।

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इन तीनों अस्त्रों (सुदर्शन चक्र, त्रिशूल और वज्र) के निर्माण के पीछे के सनातन वैज्ञानिक सिद्धांतों का विश्लेषण कर सकते हैं। यद्यपि ये पौराणिक कथाएं हैं, लेकिन इन्हें आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से समझने का प्रयास करना रोचक है।

1. सुदर्शन चक्र और त्रिशूल का निर्माण (सूर्य के तेज से)

पौराणिक कथा के अनुसार, सुदर्शन चक्र और त्रिशूल का निर्माण सूर्य के तेज को तराश कर किया गया था। इसे वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह एक ऊर्जा रूपांतरण (Energy Conversion) की प्रक्रिया हो सकती है।

  • अत्यधिक ऊर्जा का स्रोत: सूर्य में निरंतर नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) होता रहता है, जो अपार ऊर्जा और उच्च तापमान उत्पन्न करता है। इस ऊर्जा को आधुनिक विज्ञान में नियंत्रित करना असंभव है, लेकिन पौराणिक कथाओं में विश्वकर्मा ने यही किया। उन्होंने सूर्य की ऊर्जा को नियंत्रित करके उसे ठोस रूप में बदला।
  • प्लाज्मा और धातु विज्ञान: सूर्य का बाहरी वातावरण प्लाज्मा (Plasma) अवस्था में होता है, जो अत्यधिक गर्म और आवेशित गैस होती है। यह संभव है कि विश्वकर्मा ने इस प्लाज्मा ऊर्जा को किसी विशेष धातु में रूपांतरित किया हो, जो इन अस्त्रों के लिए आधार बनी।
  • ऊर्जा का भंडारण: सुदर्शन चक्र को एक ऐसा हथियार माना जाता है जो लक्ष्य पर पहुँचकर वापस लौट आता है। यह एक प्रकार की ऊर्जा भंडारण और स्व-नियंत्रण (Self-Controlling) तकनीक हो सकती है। इसे वैज्ञानिक शब्दों में एक निर्देशित ऊर्जा हथियार (Directed Energy Weapon) कहा जा सकता है, जो अपनी ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित करता है और लक्ष्य को नष्ट कर देता है। त्रिशूल भी इसी प्रकार की ऊर्जा से बना, जिससे वह अपने वार से किसी भी वस्तु का भेदन कर सकता था।

2. वज्र का निर्माण (दधीचि ऋषि की अस्थियों से)

वज्र का निर्माण दधीचि ऋषि की अस्थियों से हुआ था। यह कथा भी एक अद्भुत वैज्ञानिक सिद्धांत को दर्शाती है: कार्बन-आधारित सामग्री का उपयोग

  • अस्थि का वैज्ञानिक आधार: मानव अस्थियाँ कैल्शियम फॉस्फेट (Calcium Phosphate) और कार्बनिक पदार्थों से बनी होती हैं। कैल्शियम फॉस्फेट बहुत कठोर होता है, लेकिन अस्थि को अत्यधिक मजबूती और लचीलापन देने वाला तत्व कार्बन होता है।
  • मिश्र धातु (Alloy) का सिद्धांत: यह संभव है कि विश्वकर्मा ने अस्थि के कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों को किसी धातु के साथ मिलाकर एक ऐसी मिश्र धातु (Alloy) बनाई हो जो अत्यंत हल्की, टिकाऊ और अविनाशी हो। आधुनिक विज्ञान में, धातु को और मजबूत बनाने के लिए उसमें कार्बन को मिलाया जाता है (जैसे स्टील में)। वज्र का निर्माण भी कुछ इसी प्रकार की प्रक्रिया हो सकती है, जहाँ कार्बन-समृद्ध अस्थियों का उपयोग करके एक अति-मजबूत और वज्र जैसी कठोर संरचना बनाई गई।
  • अत्यधिक वेग और शक्ति: वज्र को एक ऐसा अस्त्र माना जाता है जो बिजली की गति से चलता है। वैज्ञानिक रूप से यह बताता है कि इसका डिज़ाइन ऐसा था जो वायुगतिकीय (Aerodynamic) सिद्धांतों पर आधारित था, जिससे यह हवा के घर्षण को कम करके अत्यधिक वेग प्राप्त कर सके। वज्र की शक्ति को आधुनिक भौतिकी के अनुसार काइनेटिक ऊर्जा (Kinetic Energy) से जोड़ा जा सकता है - जहाँ एक हल्की वस्तु भी अत्यधिक गति के कारण प्रचंड शक्ति उत्पन्न कर सकती है।

भगवान विश्वकर्मा ने कुछ दिव्य रथों और उड़ने वाले विमानों का भी निर्माण किया था।

  • पुष्पक विमान: रामायण में वर्णित रावण का पुष्पक विमान भी विश्वकर्मा द्वारा कुबेर के लिए बनाया गया था, जिसे बाद में रावण ने छीन लिया था। यह विमान अपनी इच्छाशक्ति से कहीं भी जा सकता था और अपने आकार को भी बदल सकता था। यह उस युग में उन्नत हवाई यात्रा और इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • अन्य दिव्य रथ: महाभारत में अर्जुन और कर्ण जैसे योद्धाओं के रथ भी अत्यंत विशेष थे, जिन्हें युद्ध के दौरान अद्भुत क्षमताओं से लैस किया गया था। इन रथों का निर्माण भी विश्वकर्मा की विशेषज्ञता के तहत ही संभव हुआ था।

इन पौराणिक कथाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण हमें दिखाता है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों और शिल्पियों के पास प्रकृति की शक्तियों को समझने और उन्हें नियंत्रित करने का अद्भुत ज्ञान था, भले ही हम अभी इसे आधुनिक शब्दावली में व्यक्त न कर पाए हों।


मानव सभ्यता के लिए महानतम योगदान 

यह माना जाता है कि विश्वकर्मा ने शिल्प और इंजीनियरिंग के मूलभूत सिद्धांत प्रदान किए, जिनसे मानव सभ्यता ने निम्नलिखित उपकरणों का विकास किया:

1. हल (Plow)

हल का आविष्कार कृषि क्रांति का आधार था। इसने मिट्टी को पलटने और बीज बोने की प्रक्रिया को आसान बनाया, जिससे खेती का उत्पादन कई गुना बढ़ गया। विश्वकर्मा के धातु विज्ञान के ज्ञान ने लोहे के मजबूत हल बनाने में मदद की।

2. पहिया और गाड़ी (Wheel and Cart)

पहिए का आविष्कार मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है। यह माना जाता है कि विश्वकर्मा ने रथों और वाहनों के निर्माण के लिए पहिए के सिद्धांतों का ज्ञान दिया। कृषि में, पहियों वाली गाड़ियों का उपयोग फसलों को खेतों से घरों तक ले जाने के लिए किया जाता था, जिससे परिवहन की प्रक्रिया बहुत कुशल हो गई।

3. कुल्हाड़ी और फावड़ा (Axe and Shovel)

कुल्हाड़ी का उपयोग पेड़ों को काटने और जमीन को साफ करने के लिए किया जाता था, जबकि फावड़ा मिट्टी खोदने और समतल करने के लिए। विश्वकर्मा के लोहारों और शिल्पियों के ज्ञान ने इन औजारों को मजबूत और टिकाऊ बनाने में मदद की।

4. कुदाल और दराँती (Hoe and Sickle)

कुदाल का उपयोग खरपतवार हटाने और मिट्टी को नरम करने के लिए होता था, जबकि दराँती फसलों की कटाई के लिए। ये छोटे लेकिन महत्वपूर्ण उपकरण थे, जो विश्वकर्मा द्वारा सिखाए गए धातु विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित थे।

5. सिंचाई उपकरण

यद्यपि कोई विशेष उपकरण का उल्लेख नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि विश्वकर्मा ने वर्षा और बांध द्वारा जल प्रबंधन और सिंचाई के सिद्धांतों का ज्ञान दिया। नदियों और तालाबों से पानी को खेतों तक लाने के लिए बनाए गए साधारण उपकरण भी उनके ज्ञान से प्रेरित थे।

संक्षेप में, विश्वकर्मा का सबसे बड़ा योगदान सीधे तौर पर कुछ विशेष कृषि उपकरणों का निर्माण नहीं, बल्कि औजार बनाने की तकनीक, धातु विज्ञान और इंजीनियरिंग के मूलभूत सिद्धांतों को प्रदान करना था। उनके दिए गए ज्ञान ने ही मानव सभ्यता को वह क्षमता दी, जिससे वह अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उपकरणों का विकास कर सके।


आधुनिक संदर्भ और विश्वकर्मा जयंती

आज भीविश्वकर्मा जयंती का त्योहार उनके महत्व को दर्शाता है। यह दिन 17 सितंबर को मनाया जाता हैक्योंकि ज्योतिष के अनुसार इस दिन सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। कन्या राशि का स्वामी बुध हैजो कलाबुद्धि और शिल्प का प्रतीक है। इसलिएयह दिन औद्योगिक और रचनात्मक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन कारीगरइंजीनियर और व्यापारी अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैंजो हमें यह सिखाता है कि हमारे काम के उपकरण भी पूजनीय हैं।

इस तरहविश्वकर्मा का जीवन हमें न केवल शिल्प और कला का महत्व सिखाता हैबल्कि यह भी बताता है कि ज्ञानकौशल और मेहनत से ही किसी भी कार्य में उत्कृष्टता प्राप्त की जा सकती है।


निर्माण में सनातन एवं नैतिक सिद्धांत

विश्वकर्मा सिर्फ शिल्पी नहीं, बल्कि एक दार्शनिक भी थे। उन्होंने अपने ग्रंथों और शिक्षाओं में निर्माण के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, कोई भी भवन या वस्तु तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक वह पर्यावरण, वास्तु और मानवीय भावनाओं के अनुरूप न हो। उन्होंने निर्माण में प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और देवताओं का सम्मान करने के सिद्धांतों को शामिल किया, जो आज के आधुनिक वास्तुकला में भी प्रासंगिक हैं।

इन सभी पहलुओं से यह स्पष्ट होता है कि विश्वकर्मा का योगदान केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका प्रभाव आज भी शिल्प, इंजीनियरिंग और वास्तुकला के क्षेत्र में जीवित है।


ग्रंथों और शिक्षाओं में निर्माण के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर भी जोर दिया।  

विश्वकर्मा ने अपने ग्रंथों में निर्माण के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर भी जोर दिया। उनके द्वारा रचित दो प्रमुख और सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ हैं:

  • विश्वकर्मप्रकाश (Vishvakarmaprakash): यह ग्रंथ विश्वकर्मा के ज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इसे 'वास्तुतंत्र' के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रंथ में न केवल भवन निर्माण, मूर्तिकला, और नगर नियोजन के नियम दिए गए हैं, बल्कि यह भी बताया गया है कि इन कार्यों को करते समय किन नैतिक मूल्यों का पालन करना चाहिए। इसमें भूमि का चयन, दिशाओं का महत्व, और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर निर्माण करने पर जोर दिया गया है। यह ग्रंथ एक शिल्पी को केवल कुशल कारीगर नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और नैतिक व्यक्ति के रूप में देखता है।
  • विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र (Vishvakarma Shilpashastra): यह एक और महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो शिल्प और कला के सिद्धांतों पर केंद्रित है। इसमें मूर्तियों, मंदिरों, और अन्य कलाकृतियों को बनाने के नियम, अनुपात, और विधियाँ दी गई हैं। इस ग्रंथ में यह भी सिखाया गया है कि कला का उद्देश्य केवल सौंदर्य उत्पन्न करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्यता को जगाना है। इसमें बताया गया है कि एक कलाकृति तब तक सफल नहीं मानी जा सकती, जब तक वह अपने उद्देश्य को पूरा न करे और दर्शकों में सही भावनाओं को न जगाए।

इन ग्रंथों का नैतिक दर्शन

सृष्टि के आरंभ में ही इन ग्रंथों में सनातन और नैतिक मूल्यों गहनता से विचार किया गया है:

  1. पर्यावरण का सम्मान: विश्वकर्मा ने सिखाया कि कोई भी निर्माण कार्य प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना करना चाहिए। भूमि का चयन, जल स्रोतों का प्रबंधन, और पेड़ों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। यह आधुनिक पर्यावरणवाद के सिद्धांतों के बहुत करीब है।
  2. मानवीय कल्याण: उनके सिद्धांतों में बताया गया है कि एक घर या भवन का निर्माण इस तरह से हो कि उसमें रहने वाले लोगों को शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य मिले। वास्तुशास्त्र के नियम इसी मानवीय कल्याण के नैतिक उद्देश्य पर आधारित हैं।
  3. कर्म का महत्व: इन ग्रंथों में कर्म की शुद्धता पर जोर दिया गया है। एक शिल्पी को अपने काम में ईमानदार, समर्पित और सत्यवादी होना चाहिए। यह माना जाता है कि काम में शुद्धता और नैतिकता से ही दिव्य ऊर्जा आती है।

इस प्रकार, विश्वकर्मा के ग्रंथ केवल तकनीकी निर्देश नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवन शैली और नैतिक आचार संहिता भी हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चा सृजन तब होता है जब ज्ञान और नैतिकता एक साथ आते हैं।

 

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